धुआँ

– A Poem by Gulzar.

आँखों में जल रहा है पर बुझता नहीं धुआँ
उठता तो है घटा-सा बरसता नहीं धुआँ

पलकों के ढाँपने से भी,रुकता नहीं धुआँ
कितनी उधेली आँखों पर बुझता नहीं धुआँ

आँखो से आँसुओं के मरासिम पुराने है
मेहमाँ यह घर में आये तो चुभता नहीं धुआँ

चूल्हे नहीं जलाये कि बस्ती ही जल गयी
कुछ रोज़ हो गए है अब उठता नहीं धुआँ

आँखों के पोछने से लगा आग का पता
यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ

काली लकीरें खींच रहा है फ़िज़ाओं में
बौरा गया है, मुँह से क्यूँ खुलता नहीं धुआँ

चिंगारी इक अटक से गयी मेरे सीने में
थोड़ा-सा आ के फूँक दो, उड़ता नहीं धुआँ।

Published by

Akarsh verma

Voracious Reader | Curious Learner | Programmer by Profession | Dreamer | Kid at heart and boy i cherish it. ♥ I tweet at : http://twitter.com/akarsh_verma

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